March 1, 2024

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होली में बहुत याद आते हैं आरके चित्रकार

होली में बहुत याद आते हैं आरके चित्रकार


 असलम सिद्दीकी की खास रिपोर्ट

           सिसवा बाजार-महराजगज। होली का त्योहार हो और आरके चित्रकार याद न आये, ऐसा हो ही नही सकता है, यह नाम हिन्दू मुस्लिम एकता का मिशाल है, आरके चित्रकार का असली नाम आले अब्बास नकवी था लेकिन होली को इन्होनें साम्प्रदायिक सौहार्द का मिशाल बना दिया था, एक सप्ताह से ही होली की हुड़दंग होती थी और नगर के लोग इस हुड़दंग का इंतजार भी करते थे और सहयोग भी।
        बताते चले आले अब्बास नकवी जिन्हे लोग आरके चित्रकार के नाम से जानते थे यह मूलतः इलाहाबाद के निवासी थे और सिसवा में 1975 में आये, यहां राजकमल बीड़ी कंपनी के प्रचार के लिए बैनर लिखने के साथ ही श्रीरामजानकी मंदिर रोड़ पर दुकान खोल पेंटर का का काम करते रहे, लेकिन यहाँ की होली आरके चित्रकार के हुड़ंदंग के बिना अधूरी लगती है, इनकी कमी आज भी लेागों का खलती है।
    होली के एक सप्ताह पहले ही व्यंग से भरी व होली पर व्यंग वाली सादी की पंप्लेट छपवा कर लोगों को बांटते थे, नगर के सम्भ्रांत लोगों पर एक से बढ़ कर एक व्यंग लिखा करते थे और लोग पढ़ कर मस्ती करते, जिसका व्यंग छपा होता वह भी मस्ती करता, तो वही हर शाम नये-नये ढ़ंग से हुड़दंग की होली होती थी, जो नगर में घूमती थी और लोग मजा लेते थे।
     कौमी एकता के प्रतीक रहे स्व0 नकवी वर्ष 2010 में अस्वस्थ होने के कारण होली की ठिठोली से दूर हो अपने गृहनगर प्रयागराज चले गए, जहां कुछ समय बाद उनका इंतकाल हो गया।

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