गोरखपुर। हुमायूंपुर उत्तरी में जलसा में क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत मो. कैफ रज़ा ने की। नात मौलाना शादाब अहमद व मौलाना समीउल्लाह ने पेश की। संचालन हाफ़िज़ अज़ीम अहमद नूरी ने किया।
सदारत करते हुए मौलाना इम्तियाज़ अहमद ने कहा कि अल्लाह का करीबी होने का ज़्यादा हकदार वह है जो सलाम करने में पहल करे। सलाम में पहल करने वाला तकब्बुर से बरी है। श्अस्सलामु अलैकुमश् (आप पर अल्लाह की सलामती हो) कहने पर दस, श्अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहिश् (आप पर अल्लाह की सलामती और रहमत हो) कहने पर बीस, श्अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व ब-र-कातुहूश् (आप पर अल्लाह की सलामती, रहमत और बरकत हो) कहने पर तीस नेकियां मिलती हैं। इन सबके ऊपर नेकियों का वायदा है। हमें यह देखने की ज़रूरत है कि आज हमने सलाम को कितना रिवाज दिया हुआ है। हमारी हाइटेक फेसबुक, वाहट्सएप जनरेशन में से ज़्यादातर तो हाय, हैलो, बॉय को ही आदाब समझे हुए हैं, हालांकि इन शब्दों के कोई मानी भी नहीं हैं। इसके बाद भी अगर हम सलाम को रिवाज न दें तो हम बड़े बदनसीब हुए। अल्लाह हाफ़िज़, खुदा हाफ़िज़ से पहले सलाम करने की आदत डालें। किसी मुसलमान से मुलाकात हो तब भी सलाम करें किसी मुसलमान से बिछड़ने लगें तब भी सलाम करें। सलाम एक दुआ है जिसके फजाइल में बेशुमार हदीसें हैं। लिहाजा सलाम को आम करें।
अंत में सलातो सलाम पढ़कर एक व नेक बनने की दुआ मांगी गई। जलसे में तमाम अकीदतमंद मौजूद रहे।



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